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ग्वालियर लोकसभा चुनाव …सालों बाद बीजेपी की राह मुश्किल, कांग्रेस कड़ी टक्कर देने को तैयार

किस्सा कुर्सी का: बात सिंधिया के राजघराने ‘ग्वालियर’ लोकसभा सीट की
ग्वालियर।डेटलाइन न्यूज़
देश की बहुप्रतिष्ठित लोकसभा सीटों में से एक ग्वालियर लोकसभा सिंधिया परिवार का गढ़ मानी जाती है। ग्वालियर को राज्य का सबसे प्रभावशाली संसदीय क्षेत्र माना जाता है। ग्वालियर सीट पर ज्यादातर सिंधिया राजघराने का ही राज रहा है। यह एसी सीट है जहां से कई दिग्गज नेता सांसद रह चुके हैं। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, ग्वालियर की राजमाता विजयाराजे सिंधिया, कांग्रेस के दिग्गज नेता माधवराव सिंधिया, यशोदाराजे सिंधिया जैसे दिग्गज नेता इस सीट पर जीत दर्ज कर संसद पहुंच चुके हैं। मौजूदा समय में मोदी सरकार के मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर यहां से सांसद हैं।2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने महापौर विवेक शेजवलकर को मैदान में उतारा है ,वही कांग्रेस ने लगातार चौथी बार के उम्मीदवार अशोक सिंह पर भरोसा कायम रखा है । अशोक सिंह को ग्रामीण इलाकों में भारी बहुमत से वोट मिलते है तो बीजेपी उम्मीदवार को महानगर की जनता ज्यादा वोट देती रही है।लेकिन इस बार ऐसा नही है ।बीजेपी उम्मीदवार को महापौर होने का खामियाजा भुगतना पड़ सकता है ।बीजेपी उम्मीदवार विवेक शेजवलकर को जनसंपर्क के दौरान काफी मुशिकल सवालों का सामना करना पड़ रहा है।तो दूसरी तरफ कांग्रेस उम्मीदवार अशोक सिंह को तीन हार के बाद मतदाताओं की साहनुभूति भी मिल रही हैं

ग्वालियर लोकसभा सीट का इतिहास
वर्ष 1957 में ग्वालियर में पहला लोकसभा चुनाव हुआ था। जिसे कांग्रेस के सूरज प्रसाद ने जीता था। इसके बाद अगले चुनाव में कांग्रेस ने यहां से राजमाता विजयाराजे सिंधिया को मैदान में उतारा। जिसके बाद विजयाराजे ने जनसंघ के माणिक चंद्रा को हरा दिया और वे पहली बार यहां से सांसद बनी। लेकिन 1967 के चुनाव में कांग्रेस के हाथ से यह सीट निकल गई और जनसंघ ने जीत हासिल की। इसके बाद जनसंघ ने इसी सीट पर अटल बिहारी वाजपेयी को मौका दिया, जिस पर वाजपेयी खरा उतरे और उन्होंने कांग्रेस के गौतम शर्मा को हरा दिया। हालांकि 1984 में माधवराव सिंधिया ने वाजपेयी को इस सीट पर शिकस्त दी थी। माधवराव सिंधिया का विजय रथ इसके बाद से चार चुनावों तक चला। लेकिन 1999 में हुए लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने यह सीट कांग्रेस से छीन ली। जय भान सिंह बीजेपी के टिकट से इस सीट पर जीतने वाले पहले सांसद बने। लेकिन 2004 में ही उन्हें कांग्रेस के रामसेवक सिंह से हार का सामना करना पड़ गया।

महल का बड़ा प्रभाव
कांग्रेस के सबसे वरिष्ठ नेताओं में से एक माधवराव सिंधिया का निधन कांग्रेस के लिए एक बड़ा झटका रहा। कांग्रेस ने ग्वालियर का सबसे ताकतवर नेता खो दिया। जिसका असर आज भी देखने को मिलता है। 2007 मे हुए उपचुनाव में बीजेपी ने इस सीट पर बड़ा दांव खेलते हुए माधवराव सिंधिया की बहन यशोधरा राजे सिंधिया को मैदान में उतारा और यशोधरा राजे ने इस चुनाव में कांग्रेस के अशोक सिंह को मात दे दी। बस यही वक्त था जिसके बाद से बीजेपी ग्वालियर में मजबूत होना शुरू हो गई। इसके बाद लोकसभा चुनाव 2009 में ग्वालियर से एक बार फिर से यशोधरा राजे सिंधिया को मौका दिया गया औऱ उन्होंने फिर से कांग्रेस के आशोक सिंह को हरा दिया।
यशोधरा राजे ग्वालियर का मजबूत चेहरा बन चुकी थीं और बीजेपी भी ग्वालियर में जमीनी पकड़ बना चुकी थी। लोकसभा चुनाव 2014 में बीजेपी ने यहां से नरेंद्र सिंह तोमर को मैदान में उतारा। यशोधर राजे के जीत के क्रम को आगे बढ़ाते हुए तोमर ने कांग्रेस के अशोक सिंह को हराया। राजनीतिक इतिहास के अनुसार ग्वालियर लोकसभा सीट पर कभी किसी एक पार्टी का दबदबा नहीं रहा है। यहां पर किसी एक परिवार का दबदबा रहा है और वो है सिंधिया परिवार। कांग्रेस की ओर से माधवराव सिंधिया यहां से सांसद रह चुके हैं तो बीजेपी की ओर से विजयराजे और यशोधरा राजे सिंधिया यहां से सांसद रह चुकी हैं। ग्वालियर लोकसभा सीट पर कांग्रेस को 8 बार, बीजेपी को 4 बार और जनसंघ को 2 बार जीत मिल चुकी है। हालांकि वर्तमान में इस सीट पर कांग्रेस की पकड़ कुछ मजबूत हुई है क्योंकि ग्वालियर और शिवपुरी के अंतर्गत आठ विधानसभा सीट आती हैं। जिसमें से 7 पर कांग्रेस तो एक पर बीजेपी का कब्जा है।

52.79 फीसदी वोटिंग
ग्वालियर की 48.96 % आबादी शहरी क्षेत्र और 51.04% आबादी ग्रामीण क्षेत्र में आती है। यहां 5.5 फीसदी लोग अनुसूचित जनजाति के औप 19.59 फीसदी लोग अनुसूचित जाती के हैं। चुनाव आयोग के अनुसार 2014 के लोकसभा चुनाव में यहां 18,77,003 मतदाता थे। जिसमें से 8,52,848 महिला और 10,24,155 पुरूष मतदाता थे। लोकसभा चुनाव 2014 में इस सीट पर 52.79 फीसदी वोटिंग हुई थी।

लोकसभा चुनाव 2014
वर्ष 2014 में हुए लोकसभा चुनाव में बीजेपी के नरेंद्र सिंह तोमर ने कांग्रेस के अशोक सिंह को शिकस्त दी थी। तोमर को जहां 4,42,796 वोट मिले थे तो वहीं अशोक सिंह को 4,13,097 वोट मिले थे। वहीं बसपा 6.88 फीसदी वोटों के साथ तीसरे स्थान पर थी।

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