Mon. May 20th, 2019

MP: 6 मई को 7 सीटों पर चुनाव की रपट;कांग्रेस के नए चेहरों से BJP का मुकबला

– प्रमोद भार्गव 
6 मई को मध्य प्रदेश में पांचवें चरण के दूसरे दौर का चुनाव होगा। उत्तर प्रदेश की सीमा से सटी पांच लोकसभा सीटें खजुराहो, सतना, रीवा, दमोह और टीकमगढ़ हैं। बुंदेलखंड कहे जाने वाले इस क्षेत्र की टीकमगढ़ सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है। यह इलाका वर्षों से सूखे के लिए अभिशप्त है। हालांकि इसका असर उप्र में आने वाले बुंदेलखंड में कहीं ज्यादा हैं। दो सीटें बैतूल और होशंगाबाद महाकौशल क्षेत्र में आती हैं। फिलहाल इन सभी सीटों पर भाजपा का कब्जा है। भाजपा ने बैतूल और खजुराहो से दो टिकट काटकर नए उम्मीदवार उतारे हैं। जबकि कांग्रेस के सातों उम्मीदवार नए चेहरे हैं। इसलिए भाजपा रक्षात्मक स्थिति में है, क्योंकि उसे सत्ता विरोधी लहर का भी सामना करना पड़ रहा है। रीवा और सतना सीटों पर बसपा का भी अच्छा-खासा दबदबा है, क्योंकि वह इन दोनों ही सीटों पर काबिज रह चुकी हैं। सपा भी जोर-अजमाइश में लगी है।
भाजपा के लिए सबसे प्रतिष्ठा वाली सीट टीकमगढ़ है। यहां से केंद्रीय मंत्री वीरेंद्र खटीक का मुकाबला कांग्रेस के किरण अहिरवार से है। वीरेंद्र की कोशिश हैट्रिक लगाने की है, तो अपनी स्वच्छ छवि और दिग्विजय सिंह के कार्यकर्ताओं को लेकर वीरेंद्र जी-जान से प्रचार में जुटे हैं। इन्हें टिकट दिग्विजय ने दिलाया है। सपा के आरडी प्रजापति यहां मुकाबले को त्रिकोणीय बनाने की कोशिश में लगे हैं। दमोह सीट पर भाजपा का कमल 1989 से लगातार खिल रहा है। उमा भारती के खास रहे प्रहलाद पटेल यहां से दूसरी बार किस्मत आजमा रहे हैं। कांग्रेस ने प्रताप सिंह लोधी को मैदान में उतारकर नए चेहरे से जीत की उम्मीद बांधी हैं। कांग्रेस यहां जातीय समीकरण और स्थानीय मुद्दों के बूते अंगद के पैर की तरह अडिग भाजपा को डिगाने की कोशिश में है। किंतु बसपा ने जीतू खरे को उतारकर छोटी जातियों का समीकरण बिगाड़ने का काम कर दिया है। ऐसे में कांग्रेस को यह किला भेदना मुश्किल होगा।
सतना में जातीय कार्ड खेलने का खुला खेल भाजपा और कांग्रेस दोनों ही खेल रहे हैं। भाजपा ने वर्तमान सांसद गणेश सिंह पटेल को, तो कांग्रेस ने राजाराम राम त्रिपाठी को मैदान में उतारा हैं। यहां ब्राह्मण बनाम पटेलों का जातीय धुवीकरण तो हो रहा है, लेकिन मजबूत जनाधार वाली बसपा ने अच्छेलाल कुशवाहा को उम्मीदवार बनाकर लड़ाई त्रिकोणीय बना दी है। यहां से बसपा एक बार जीत भी चुकी है। इस क्षेत्र में अर्जुन सिंह के परिवार की तूती बोलती हैं, बावजूद उनके पुत्र अजय सिंह यहां से करीब 9000 वोट से 2014 में हार गए थे। अर्जुन सिंह भी इस सीट से हार चुके हैं। नतीजतन उन्हें सीधी से किस्मत अजमाने का मौका दिया गया हैं। लिहाजा बदले हुए समीकरण में भाजपा के लिए यह सीट जीतना कड़ी चुनौती हैं।
रीवा में भाजपा ने सांसद जनार्दन मिश्रा को तो कांग्रेस ने स्वर्गीय सुदंरलाल तिवारी के बेटे सिद्धार्थ तिवारी को प्रत्याशी बनाया है। सिद्धार्थ कांग्रेस के दिग्गज नेता श्रीनिवास तिवारी के पौत्र हैं। इन्हें बघेलखंड का सफेद शेर कहा जाता था। सिद्धार्थ के साथ पिता की मृत्यु की सहानुभूति भी जुड़ी हैं। इस पूरे क्षेत्र में दलों से कहीं ज्यादा नेता की अहमियत है। इन दोनों ब्राह्मणों के बीच बसपा ने पिछड़े वर्ग के तुरूप का पत्ता चलते हुए कुर्मी समाज के विकास पटेल को प्रत्याशी बनाया है, इसलिए यहां भी मुकाबला त्रिकोणीय दिखाई दे रहा है। पिछले 15 साल से कांग्रेस इस सीट को नहीं जीत पाई है, जबकि बसपा ने 1991, 1996 और 2009 में विजयश्री प्राप्त की है। इसलिए यहां कांग्रेस की राह एक बार फिर कठिन है।
काम-कला की मूर्तियों के लिए प्रसिद्ध मंदिरों की नगरी खजुराहो में मुकाबला दिलचस्प है। यहां भाजपा ने अपने वर्तमान सांसद नागेंद्र सिंह का टिकट काटकर संघ की पृष्ठभूमि से आए बीडी शर्मा को मैदान में उतारा है। एक समय यह सीट उमा भारती के कब्जे में भी रही है। लोधी बहुल होने के कारण उमा का आज भी यहां वर्चस्व है। लेकिन बाहरी प्रत्याशी होने के कारण भाजपा कार्यकर्ता इनका विरोध कर रहे हैं। हालांकि अब संघ के दखल के चलते विरोध शांत हो गया है। चूंकि यहां तीन लाख से भी ज्यादा ब्राह्मण मतदाता हैं। इसलिए शर्मा की उम्मीदवारी तय की गई है। वैसे यहां सबसे ज्यादा वोट पिछड़ी जातियों के हैं। कांग्रेस ने विधायक विक्रम सिंह की पत्नी कविता सिंह को प्रत्याशी बनाया है। दरअसल यहां छतरपुर के शाही परिवार विक्रम सिंह की रियासत की धमक अभी भी असर दिखा रही हैं। सपा ने यहां से कुख्यात डकैत रहे ददुआ के बेटे वीर सिंह पटेल को उम्मीदवार बनाया है। वे कुर्मी जाति से है। लेकिन पृष्ठभूमि ठीक नहीं होने के कारण प्रजा में उनका असर नगण्य दिखाई दे रहा है।
महा कौशल के होशंगाबाद में भाजपा ने मौजूदा सांसद उदय प्रताप सिंह को तो कांग्रेस ने शैलेंद्र दीवान को उम्मीदवार बनाया है। पिछले तीन दशक से इस सीट को भाजपा का गढ़ माना जाता है। 1989 से लेकर 2006 तक भाजपा यहां से लगातार जीतती रही है। 2009 में कांग्रेस ने इस सीट को भाजपा से छीना तो जरूर लेकिन 2014 की मोदी लहर में भाजपा ने फिर इसे अपने अधीन कर लिया। बसपा ने यहां से एमपी चौधरी को मैदान में उतारा है, लेकिन ब्राह्मण, क्षत्रीय और बैस जातियों के 52 प्रतिशत वोट होने के कारण वह त्रिकोणीय मुकाबला बनाने में नाकाम दिख रही है। ऐसे में यहां कांग्रेस और भाजपा सीधे मुकाबले में है। महाकौशल क्षेत्र में ही आने वाली बैतूल से भाजपा ने ज्योति धुर्वे का टिकट काटकर दुर्गादास उइके को प्रत्याशी बनाया है। दुर्गादास संघ पृष्ठभूमि से भाजपा में आए हैं। उनके प्रतिद्वंदी के रूप में कांग्रेस ने आदिवासी नेता रामू टेकाम को मैदान में उतारा है। 1996 से यहां भाजपा काबिज है। यह सीट अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित है। मुख्यमंत्री कमलनाथ का यहां अच्छा-खासा प्रभाव है। बसपा ने भी यहां से अशोक भलावी को प्रत्याशी बनाया है। यदि भलावी अच्छी संख्या में वोट बटोर लेने में सफल नहीं होते है तो भाजपा यहां मुश्किल में रहेगी। गोया, यहां की जीत का परिणाम का मूल आधार बसपा को माना जा रहा है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *